घर में होकर भी अकेला….

By dzadmin

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कमरे के बगल में रहते हैं,पर बातें अब संदेशों में होती हैं।

एक ही छत के नीचे रहकर भी,दिलों में दूरियाँ होती हैं।

भाई अब सामने बैठकर,दिल की बातें नहीं करता,

चेहरे पढ़ने वाला रिश्ता भी,अब “ऑनलाइन” से आगे नहीं बढ़ता।

बहन भी अब अपने घर में,शायद बहुत खुश रहती है,

जिस भाई की डाँट में भी,सिर्फ बहन की फिक्र छुपी रहती थी।

अब शायद उसे एहसास भी नहीं कि,उसका भाई आज भी उसे उतना ही याद करता है।

घर के सारे फ़ैसले होते हैं,माँ, पिता, बहन, छोटे भाई के बीच,

कोई ये तक सोचता नहीं —एक बड़ा भाई भी है इस भीड़ के बीच।

ना कोई राय पूछता है अब,ना कोई हाल सुनना चाहता है,

बस ज़रूरत भर के रिश्ते हैं,हर कोई खुद में रहना चाहता है।

अब सीख लिया है मैंने भी —खुद ही खुद का सहारा बनना,

जब अपने साथ ना दें,तब अकेले ही आगे बढ़ना।

कभी जो घर की आवाज़ हुआ करता था,आज वही खामोशी में खो जाता है।

सबको संभालने वाला इंसान ही,अक्सर सबसे पीछे रह जाता है।

ना गुस्सा बचा, ना कोई शिकवा,बस आदत सी हो गई है चुप रहना,

अपने ही घर में मेहमान सा लगना,शायद यही कीमत है, घर में बड़ा होना।

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